Sunday, May 24, 2026
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संविधान की प्रस्तावना पर टकराव: ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्दों को लेकर गरमाई राजनीति

खरगे की सख्त चेतावनी: "संविधान के शब्दों को छुआ तो होगा पुरजोर विरोध"

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आरएसएस नेता दत्तात्रेय होसबाले के उस बयान का तीखा विरोध किया है जिसमें उन्होंने संविधान की प्रस्तावना से समाजवादीऔर धर्मनिरपेक्षशब्दों की समीक्षा की मांग की थी। खरगे ने स्पष्ट कहा कि अगर संविधान में कोई भी शब्द बदला गया तो कांग्रेस इसका सख्त विरोध करेगी।

 

 “होसबाले मनुस्मृति के समर्थक हैं

बेंगलुरु में पत्रकारों से बात करते हुए खरगे ने होसबाले पर निशाना साधते हुए उन्हें मनुस्मृति का आदमी बताया। उन्होंने कहा कि होसबाले नहीं चाहते कि गरीब, दलित और वंचित वर्ग समाज में आगे बढ़ें। उनके अनुसार, यह विचार केवल होसबाले का नहीं, बल्कि पूरे आरएसएस की सोच को दर्शाता है।

आरएसएस नेता का तर्क: “बाबा साहेब ने ये शब्द नहीं जोड़े थे”

दत्तात्रेय होसबाले ने एक कार्यक्रम में कहा कि संविधान की मूल प्रस्तावना में समाजवादऔर धर्मनिरपेक्षताशब्द शामिल नहीं थे। ये शब्द 1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन से जोड़े गए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इन शब्दों को अब भी प्रस्तावना में रहना चाहिए या नहीं — इस पर पुनर्विचार होना चाहिए।

कांग्रेस का आरोप: “आरएसएस दलितविरोधी मानसिकता रखता है

खरगे ने कहा कि आरएसएस हमेशा से दलितों, गरीबों और पिछड़े वर्गों के खिलाफ रहा है। अगर वे वाकई हिंदू धर्म के रक्षक हैं, तो उन्हें पहले अस्पृश्यता जैसी कुप्रथा को खत्म करने की दिशा में काम करना चाहिए, न कि संविधान के बुनियादी मूल्यों से छेड़छाड़ करनी चाहिए।

समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का इतिहास

भारत के संविधान में इन दोनों शब्दों को 1976 में 42वें संशोधन के जरिए जोड़ा गया था। इससे पहले ये प्रस्तावना में नहीं थे, हालांकि संविधान की मूल भावना इन मूल्यों पर आधारित थी। तब से यह मुद्दा लगातार विवादों में रहा है कि क्या इन शब्दों को जोड़ना आवश्यक था या केवल राजनीतिक कारणों से ऐसा किया गया।

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