अहिंसा और प्रेम में समाज को जोड़ने की शक्ति है
— गोविन्द विश्वकर्मा
महात्मा गांधी जी केवल भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक ही नहीं थे, बल्कि वे मानवता, सत्य, अहिंसा और प्रेम के ऐसे पुजारी थे, जिनके विचार आज भी पूरे विश्व को राह दिखाते हैं। उन्होंने अपने जीवन और संघर्ष से यह सिद्ध किया कि किसी व्यक्ति या व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए हिंसा ही एकमात्र रास्ता नहीं है। सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए भी बड़े से बड़ा परिवर्तन संभव है।
गांधी जी का जीवन हमें सिखाता है कि अहिंसा कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल की सबसे बड़ी पहचान है। हिंसा से भय पैदा किया जा सकता है, लेकिन प्रेम से विश्वास पैदा होता है। हिंसा किसी को कुछ समय के लिए झुका सकती है, लेकिन प्रेम, सत्य और करुणा उसके हृदय को बदलने की क्षमता रखते हैं।
आज हमारा समाज अनेक प्रकार के मतभेदों से गुजर रहा है। जाति, धर्म, भाषा, विचार और राजनीतिक मतों के आधार पर लोगों के बीच दूरियां बढ़ती दिखाई देती हैं। ऐसे समय में गांधी जी का अहिंसा और प्रेम का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि हम एक-दूसरे की बात सुनें, असहमति का सम्मान करें और विवादों का समाधान संवाद के माध्यम से करने का प्रयास करें, तो समाज में तनाव और कटुता को कम किया जा सकता है।
अहिंसा का अर्थ केवल किसी को शारीरिक चोट न पहुंचाना नहीं है। किसी के प्रति घृणा रखना, अपमानजनक शब्द बोलना, जानबूझकर किसी को मानसिक पीड़ा देना या अपने विचार दूसरों पर जबरन थोपना भी उस भावना के विपरीत है, जिसे गांधी जी ने अहिंसा के रूप में समझाया। अहिंसा हमें संयम सिखाती है। यह हमें सिखाती है कि क्रोध के क्षण में भी अपने शब्दों पर नियंत्रण रखें, मतभेद होने पर रिश्तों को न तोड़ें और किसी की गलती का जवाब दूसरी गलती से न दें।
प्रेम केवल परिवार तक सीमित भावना नहीं है। जब हमारे मन में दूसरे व्यक्ति के प्रति सम्मान, संवेदना और अपनापन होता है, तभी एक स्वस्थ और मजबूत समाज का निर्माण होता है। एक शिक्षक अपने विद्यार्थी के साथ प्रेम और विश्वास से व्यवहार करता है तो बच्चा बेहतर सीखता है। पड़ोसी एक-दूसरे के सुख-दुःख में खड़े होते हैं तो मोहल्ला परिवार जैसा बन जाता है। अलग-अलग विचार रखने वाले लोग एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हैं तो समाज और मजबूत होता है। इसलिए प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि सामाजिक एकता की आधारशिला भी है।
आज संचार के साधन हमारे हाथ में हैं। सोशल मीडिया पर कुछ ही क्षणों में कोई बात हजारों लोगों तक पहुंच जाती है। ऐसे समय में गांधी जी का सत्य, संयम और अहिंसा का विचार हमें यह सिखाता है कि किसी बात को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सत्यता पर विचार करें। किसी के विचार से असहमत होना स्वाभाविक है, लेकिन असहमति को दुश्मनी में बदल देना समाज के लिए नुकसानदायक है। हमें विचारों से असहमत होना सीखना चाहिए, इंसानों से नफरत करना नहीं।
यदि समाज में संवाद बढ़े, कटुता घटे, एक-दूसरे के प्रति सम्मान बढ़े और कमजोर तथा जरूरतमंद व्यक्ति के प्रति संवेदना पैदा हो, तो यही गांधी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। गांधी जी का जीवन बच्चों और युवाओं के लिए भी विशेष प्रेरणा है। उन्होंने सत्य को केवल भाषण का विषय नहीं बनाया, बल्कि उसे अपने जीवन और आचरण में उतारने का प्रयास किया।
आज के बच्चों को यदि हम केवल सफल होने की शिक्षा देंगे, लेकिन अच्छा इंसान बनने की शिक्षा नहीं देंगे, तो हमारा समाज अधूरा रह जाएगा। इसलिए शिक्षा के साथ सत्य, करुणा, अनुशासन, सहनशीलता और दूसरों के सम्मान की भावना भी उतनी ही आवश्यक है।
महात्मा गांधी जी को याद करना केवल उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाना नहीं है। उनके विचारों को अपने व्यवहार में उतारना ही उनके प्रति सच्चा सम्मान है। जब हम क्रोध में भी किसी से अपशब्द न बोलें, किसी कमजोर का मजाक न उड़ाएं, झूठ के बजाय सत्य का साथ दें, मतभेद के बावजूद सामने वाले का सम्मान करें और हिंसा के बजाय संवाद का रास्ता चुनें, तब हमारे जीवन में गांधी जी के विचार जीवित होते हैं।
गांधी जी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि समाज को बदलने की शुरुआत दूसरों से नहीं, बल्कि स्वयं से करनी चाहिए। आइए, इस अवसर पर हम संकल्प लें कि अपने घर, विद्यालय, समाज और आसपास के वातावरण में प्रेम, शांति, सत्य और सद्भाव को बढ़ाने का प्रयास करेंगे। किसी को हराने से अधिक महत्वपूर्ण है किसी टूटे हुए मन को संभालना और किसी बिखरते रिश्ते को बचाना।
हिंसा से समाज में भय पैदा हो सकता है, लेकिन प्रेम से समाज में विश्वास पैदा होता है। घृणा दूरियां बढ़ाती है, लेकिन अहिंसा और प्रेम दिलों को जोड़ते हैं।
महात्मा गांधी जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। उनके सत्य, अहिंसा, प्रेम और मानवता के संदेश को अपने जीवन में उतारना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।



